Friday, 29 January 2016

बौद्ध संगीति क्या है

बौद्ध संगीति का तात्पर्य उस 'संगोष्ठी' या 'सम्मेलन' या 'महासभा' से है, जो तथागत बुद्ध के परिनिर्वाण के अल्प समय के पश्चात से ही उनके उपदेशों को संगृहीत करने, उनका पाठ (वाचन) करने आदि के उद्देश्य से सम्बन्धित थी। इन संगीतियों को प्राय: 'धम्म संगीति' (धर्म संगीति) कहा जाता था। संगीति का अर्थ होता है कि 'साथ-साथ गाना'।

  इतिहास में चार बौद्ध संगीतियों का उल्लेख हुआ है-


प्रथम बौद्ध संगीति (483 ई.पू.)
आज राम = आज+रा+म
1. आज-अजातशत्रु (शासनकाल)
2. रा-राजगृह (स्थान)
3. म-महाकश्यप (अध्यक्ष)

 प्रथम बौद्ध संगीति का आयोजन 483 ई.पू. में 'राजगृह' (आधुनिक राजगिरि), बिहार की 'सप्तपर्णि गुफ़ा' में किया गया था। गौतम बुद्ध के निर्वाण प्राप्त करने के कुछ समय बाद ही इस संगीति का आयोजन किया गया था।

इस संगीति में बौद्ध स्थविरों (थेरों) ने भी भाग था।
बुद्ध के प्रमुख शिष्य 'महाकस्यप' (महाकश्यप) ने इसकी अध्यक्षता की।
तथागत बुद्ध ने अपनी शिक्षाओं को लिपिबद्ध नहीं किया था, इसीलिए संगीति में उनके तीन शिष्यों-'महापण्डित महाकाश्यप', सबसे वयोवृद्ध 'उपालि' तथा सबसे प्रिय शिष्य 'आनन्द' ने उनकी शिक्षाओं का संगायन किया।
इसके पश्चात उनकी ये शिक्षाएँ गुरु-शिष्य परम्परा से मौखिक चलती रहीं, उन्हें लिपिबद्ध बहुत बाद में किया गया। ये बौद्ध काल की प्रथम संगीति हुयी॥

द्वितीय बौद्ध संगीति (383 ई.पू.)
कल वैशाली सब = कल+वैशाली+सब
1. कल-कालाशोक (शासनकाल)
2. वैशाली-वैशाली (स्थान)
3. सब-सबाकामी (अध्यक्ष)

  दूसरी बौद्ध सगीति का आयोजन वैशाली में किया गया था। इस संगीति का आयोजन 'प्रथम बौद्ध संगीति' के एक शताब्दी बाद किया गया।

एक शताब्दी बाद बुद्धोपदिष्ट कुछ विनय-नियमों के सम्बन्ध में भिक्षुओं में विवाद उत्पन्न हो गया।
इस विवाद के परिणामस्वरूप ही वैशाली में यह बौद्ध संगीति आयोजित हुई।
इस संगीति में विनय-नियमों को और भी कठोर बनाया गया।
जो बुद्धोपदिष्ट शिक्षाएँ अलिखित रूप में प्रचलित थीं, उनमें संशोधन कर दिया गया।

तृतीय बौद्ध संगीति (255 ई.पू.)
आपके मत = आ+पके+म+त
1. आ-अशोक (शासनकाल)
2. पके-पाटलिपुत्र (स्थान)
3. म+त-मोग्गलीपुत्त तिस्स (अध्यक्ष)

तीसरी बौद्ध संगीति का आयोजन 249 ई.पू. में सम्राट अशोक के शासनकाल में पाटलीपुत्र में किया गया था। इस बौद्ध संगीति की अध्यक्षता तिस्स ने की थी। इसी संगीति में 'अभिधम्मपिटक' की रचना हुई और बौद्ध भिक्षुओं को विभिन्न देशों में भेजा गया। इनमें अशोक के पुत्र महेंद्र एवं पुत्री संघमित्रा को श्रीलंका भेजा गया था।

बौद्ध अनुश्रुतियों के अनुसार तथागत बुद्ध के निर्वाण के 236 वर्ष बाद इस संगीति का आयोजन हुआ।
सम्राट अशोक के संरक्षण में तीसरी संगीति 249 ई.पू. में पाटलीपुत्र में हुई थी।
इसकी अध्यक्षता प्रसिद्ध बौद्ध ग्रन्थ ‘कथावत्थु’ के रचयिता तिस्स मोग्गलीपुत्र ने की थी।
विश्वास किया जाता है कि इस संगीति में 'त्रिपिटक' को अन्तिम रूप प्रदान किया गया।
यदि इसे सही मान लिया जाए कि अशोक ने अपना सारनाथ वाला स्तम्भ लेख इस संगीति के बाद उत्कीर्ण कराया था, तब यह मानना उचित होगा, कि इस संगीति के निर्णयों को इतने अधिक बौद्ध भिक्षु-भिक्षुणियों ने स्वीकार नहीं किया कि अशोक को धमकी देनी पड़ी कि संघ में फूट डालने वालों को कड़ा दण्ड दिया जायेगा।
इस संगीति के बाद भी भरपूर प्रयास किए गए कि सभी भिक्षुओं को एक ही तरह के बौद्ध संघ के अंतर्गत रखा जाये, किंतु देश और काल के अनुसार इनमें बदलाव आता रहा।इस तरह ये तीसरी संगीति अशोक के शासन मे हुयी।

चतुर्थ बौद्ध संगीति (ई. की प्रथम शताब्दी)
कनकवन में अब = कन+क+वन+में+अ+ब
1. कन-कनिष्क (शासनकाल)
2. क+वन-कुण्डलवन (स्थान)
3. अ+ब-अश्वघोस/बसुमित्र/वसुमित्र (अध्यक्ष)
अंतिम बौद्ध संगीति कुषाण सम्राट कनिष्क के शासनकाल (लगभग 120-144 ई.) में हुई। यह संगीति कश्मीर के 'कुण्डल वन' में आयोजित की गई थी। इस संगीति के अध्यक्ष वसुमित्र एवं उपाध्यक्ष अश्वघोष थे। अश्वघोष कनिष्क का राजकवि था।

 इसी संगीति में बौद्ध धर्म दो शाखाओं- हीनयान और महायान में विभाजित हो गया। हुएनसांग के मतानुसार सम्राट कनिष्क की संरक्षता तथा आदेशानुसार इस संगीति में 500 बौद्ध विद्वानों ने भाग लिया और त्रिपिटक का पुन: संकलन व संस्करण हुआ। इसके समय से बौद्ध ग्रंथों के लिए संस्कृत भाषा का प्रयोग हुआ और महायान बौद्ध संप्रदाय का भी प्रादुर्भाव हुआ। इस संगीति में नागार्जुन भी शामिल हुए थे। इसी संगीति में तीनों पिटकों पर टीकायें लिखी गईं, जिनको 'महाविभाषा' नाम की पुस्तक में संकलित किया गया। इस पुस्तक को बौद्ध धर्म का 'विश्वकोष' भी कहा जाता है।इस तरह अब तक बौद्ध धर्म की चार संगीतियां हुयी

Monday, 25 January 2016

भारत विश्व गुरु कैसे बन सकता है.?

जय सम्राट अशोक नमो बुद्धाय

भारत विश्व गुरु तब तक नहीं बन सकता जब तक कि हम अपने पूर्वजों की नीतियों पर नहीं चलेंगे। महान सम्राट चंद्र गुप्त मौर्य व सम्राट अशोक की कार्यशैली सर्वश्रेष्ठ थी। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद तमाम शासकों के जीवनकाल के अध्ययन में भी यह साबित हो चुका है कि अशोक महान की शासन शैली सबसे अच्छी थी।
लिहाजा विश्व के कई देशों ने सम्राट अशोक की शासन शैली को अपनाया। सम्राट अशोक ही ऐसे शासक थे, जिन्होंने सिकंदर जैसे लड़ाके को देश के बाहर भगाया। इस महान शासक और बुद्ध को आज भुलाया जा रहा है। बुद्ध को पूरा विश्व गुरु मानता है। उन्हें भारत में ही पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया जाता। जबकि बुद्ध के विचार पूरी तरह विज्ञान पर आधारित हैं। लोग जब तक धम्म के मार्ग पर नहीं चलेंगे और सम्राट अशोक की शासन प्रणाली को लागू नहीं किया जाएगा। तब तक भारत आगे नहीं बढ़ सकता है।

Wednesday, 16 December 2015

सूर्यवंशी क्षत्रिय चक्रवर्ती सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के जीवन के बारे में कुछ महत्वपूर्ण तथ्य

=====================
"सूर्यवंशी क्षत्रिय चक्रवर्ती सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य" के जीवन के बारे में कुछ महत्वपूर्ण तथ्य
=====================
विज्ञात पिता के विख्यात पुत्र चन्द्रगुप्त मौर्य का जन्म लगभग 345 ईसा पूर्व उत्तरविहारट्टकथायं के अनुसार वैशाख,कृष्णपक्ष अष्टमी को हुआ था। प्राचीन पालि साहित्य ग्रन्थों के अनुसार चन्द्रगुप्त मौर्य के पूर्वज हिमालय की तराई में स्थित पिप्पलियवन के मोरिय गणराज्य में भगवान बुद्ध के समय शासन करते थे।भारत की सबसे प्राचीन भाषा पालि की इन गाथाओ में चन्द्रगुप्त मौर्य का परिचय इस प्रकार है।

आदिच्चा नाम गोतेन, सकिया नाम जातिया।
मोरियान खतियानं वसंजातं सिरिधरं।
चन्दगुप्तो ति पञ्ञातं,विण्हुगुप्तोति भतुकाततो।।
(उत्तरविहारट्टकथायं-थेरमहिंद)


इसका हिंदी अर्थ यह है -\
 आदित्य-गोत्र, शाक्य-जाति,मौर्यवशं के क्षत्रियों में प्रज्ञा सम्पन्न श्रीमान चन्द्रगुप्त राजा हुए और उनके भाई विष्णुगुप्त।

आधुनिक खोजो से ज्ञात होता है कि चन्द्रगुप्त मौर्य के पिता राजा चन्द्रवर्द्धन (340 ई0पू0) 34 वर्ष की अवस्था में मगध के विस्तारवादी सीमा सम्बन्धी युद्ध करते हुए मारे गये थे । इस घटना के बाद चन्द्रगुप्त मौर्य की माँ धम्ममोरिया देवी, अपने पुत्र के साथ पाटलिपुत्र (पुष्पपुर) आ गयी और अपने राजवंश को गुप्त रखने के लिए संभवतः मयुर पालको के रूप में अज्ञातवास का जीवन व्यतीत करने लगी । यही चन्द्रगुप्त का शैसो काल मयूर पालको,शिकारीयों तथा ग्वालों के मध्य व्यतीत हुआ। इस प्रकार राजा चन्द्र व रानी मोरिया देवी के पुत्र को गुप्त रखने से उनका नाम चन्द्रगुप्त मौर्य ही पड़ गया। यही कारण है कि कुछ इतिहासकारों को भ्रमवश लगता है कि चन्द्रगुप्त निम्न कुल के है। बड़ा होने पर उन्होने मगध की सेना में नौकरी कर ली और अपनी योग्यता के बल पर सेनापति के पद तक जा पहुचे। 326 ईसा पूर्व में सिकन्दर की सेनाए पजाब के विभिन्न राज्यों में विध्वंशक युद्ध में व्यस्त थी। मध्य प्रदेश व विहार में नन्द वश का राजा घननन्द राज्य कर रहा था। सिकन्दर के आक्रमण से देश के लिए संकट पैदा हो गया था। मगध की जनता घनान्द के अत्याचारों से पीड़ित थी । असहाय कर भार के कारण राज्य के लोग उससे असन्तुष्ठ थे।  देश को इस समय एक ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता थी, जो मगध सामाज्य की रक्षा तथा वृद्धि कर विदेशी आक्रमण के सकट को दूर करे उस महान व्यक्ति का नाम था-
   
    ---राजकुमार चद्रगुप्त मौर्य---

Saturday, 12 December 2015

बुद्ध का जन्म ओक्कक किस वंश में हुआ था

पाली ग्रन्थ महावंश के अनुसार- गौतम बुद्ध का जन्म ओक्कक वंश में हुआ था। इतिहासकार इसी ओक्कक का हिंदी में अनुवाद इक्ष्वाकु के नाम से करते है।


  1. ओक्कक
  2. ओक्कामुख
  3. शिविसामज्य
  4. सिंहस्र
  5. जयसेन
  6. सिंह्हनु
  7. शुद्धोदन
  8. सिद्धार्थ
  9. राहुलवंशावली  
                                        से स्पष्ट है ही कि गौतम बुद्ध ओक्कक(इक्ष्वाकु) वंश की आठवीं पीढ़ी में पैदा हुए थे। शाक्य गणराज के कुछ शाक्य भारत के वर्तमान गोरखपुर के पास पिप्लीवन में आकर बस गए थे।

 पिप्लीवन में बहुत अधिक मोर होने के कारण इस क्षेत्र को लोग मोरिय बोलने लगे।
 बाद में यही स्थान मोरिय गणराज्य बना और मोरिय गणराज्य के शाक्य वंशी मौर्य कहलाने लगे। 
ओक्कक वंशियो का एक गणराज्य कोलिय गणराज्य भी था ।
इस गणराज्य के निवासी कोलिय कहलाते थे । इन कोलियों में कुछ शाक्य और मौर्य भी सम्मिलित थे। 
ओक्कक वंशियो का एक मालव गणराज्य भी था जिसके निवासी मालव कहलाते थे।
भारत के उत्तर-पश्चिम क्षेत्र से आक्रमण होता रहता था, इसलिए मौर्य सम्राटो ने अपने शूरवीर सैनिको को उत्तर पश्चिम क्षेत्र में बसाया था। ये सैनिक शाक्य, मौर्य, कोलिय, मालव आदि अनेक जनसमूह के थे।
 जाति व्यवस्था मौर्य शासनकाल के बाद आई है। 

Friday, 4 December 2015

नेपाल ने किया भारत को शर्मसार

नेपाल ने  बुद्धा एयरलाइंस

           शुरू कर फिर किया भारत को शर्मसार

                          जिस भारत  देश को विश्व में बुद्ध के देश से जाना जाता है वहाँ बुद्ध का  हाल बेहाल है । यह और कुछ नही भारत में संघी साजिस का नतीजा है ।

                 संसार के सबसे कम बौद्ध पर्यटक भारत में आते है ।जबकि बुद्ध का कार्यक्षेत्र भारत ही रहा है , इसका कारण भारत में बुद्ध की उपेक्षा है ।  नेपाल/ जापान/ चीन /थाईलैंड /बर्मा/ वियतनाम/ श्रीलंका में भारत से कही  जादा  बौद्ध पर्टयक आते है ।

       अब तो नेपाल ने बुद्ध को भी भारत से  छीन लिया है । यह भारत के लिए शर्मनाक कृत्य है ।

                     नेपाल को बुद्धा एयरलाइंस शुरू करने पर और बुद्ध के नाम /फोटो वाले रूपये और सिक्के चलने पर  बहुत बहुत साधुवाद ।   

Friday, 27 November 2015

बाबा साहब की 22 महाप्रतिज्ञा



  • मैं ब्रह्मा, विष्णु, महेश को कभी ईश्वर नही मानूंगा.ना उनकी उपासना करूँगा.
  • मैं राम और कृष्ण को कभी ईश्वर नही मानूंगा और ना ही उनकी उपासना करूँगा.
  • मैं गौरी, गणपति, इत्यादि हिन्दू धर्म के किसी भी देवता को नही मानूंगा और ना उनकी उपासना करूँगा.
  • ईश्वर ने कभी अवतार धारण किया है इस पर मेरा विश्वास नही है.
  • बुद्ध विष्णु का अवतार हैं ये झूठा और शरारती प्रचार है.
  • मैं श्राद्ध पक्ष नही करूँगा और ना ही कभी पिंडदान करूँगा.
  • मैं बौद्ध धम्म के विरूद्ध ऐसा कोई भी आचरण नही करूंगा.
  • मैं कोई भी क्रिया कर्म ब्राह्मणों के हाथ से नही करवाऊंगा.
  • सभी मनुष्य मात्र समान है ऐसा मे मानता हूँ.
  • मैं समता स्थापित करने का प्रयास करूँगा.
  • मैं तथागत गौतम बुद्ध के बताये हुए अष्टांग मार्ग का पूर्ण पालन करूँगा.
  • मैं तथागत बुद्ध के बताई दस पारमिताओं का पूर्ण पालन करूंगा.
  • मैं सभी प्राणी मात्र पर दया करूँगा और उनका लालन पालन करूँगा.
  • मैं चोरी नही करूँगा.
  • मैं व्याभिचार नही करूंगा.
  • मैं झूठ नही बोलूँगा.
  • मैं शराब मदिरा आदि का सेवन नही करूंगा.
  • प्रज्ञा,शील, करुणा धम्म के इन तीन तत्वों का मेल करके मे जीवन व्यतीत करूँगा.मेरे पुराने मनुष्य मात्र के उत्कर्ष में हानिकारक होने वाले और मनुष्य मात्र को असमान और नीच मानने वाले हिन्दू धर्म को त्याग करता हूँ और बुद्ध धम्म स्वीकार करता हूँ.
  • बुद्ध धम्म सध्म्म है इसका मुझे यकीन हुआ है और रहेगा.
  • आज मेरा नया जन्म हुआ है ऐसा मे मानता हूँ.
  • इसके बाद मे बुद्ध की शिक्षा के अनुसार आचरण करूँगा ऐसी प्रतिज्ञा करता हूँ.

बुद्ध प्रभात 🌺🌻🌻जय भीम !! जय भारत !!!..

Wednesday, 18 November 2015

विजय दशमी बौद्धों का पवित्र त्यौहार है, vijayadasmi is thae holy festival of buddhists

विजय दशमी बौद्धों का पवित्र त्यौहार है।

ऐतिहासिक सत्यता है कि महाराजा अशोक ने
कलिंग युद्ध के बाद हिंसा का मार्ग त्याग कर बौद्ध
धम्म अपनाने की घोषणा कर दी थी। बौद्ध बन जाने
पर वह बौद्ध स्थलों की यात्राओं पर गए। तथागत
गौतम बुद्ध के जीवन को चरितार्थ करने तथा अपने
जीवन को कृतार्थ करने के निमित्त हजारों स्तूपों
,शिलालेखों व धम्म स्तम्भों का निर्माण कराया।
सम्राट अशोक के इस धार्मिक परिवर्तन से खुश होकर
देश की जनता ने उन सभी स्मारकों को सजाया
संवारा तथा उस पर दीपोत्सव किया। यह आयोजन
हर्षोलास के साथ १० दिनों तक चलता रहा, दसवें दिन
महाराजा ने राजपरिवार के साथ पूज्य भंते
मोग्गिलिपुत्त तिष्य से धम्म दीक्षा ग्रहण की। धम्म
दीक्षा के उपरांत महाराजा ने प्रतिज्ञा की, कि
आज के बाद मैं शास्त्रों से नहीं बल्कि शांति और
अहिंसा से प्राणी मात्र के दिलों पर विजय प्राप्त
करूँगा। इसीलिए सम्पूर्ण बौद्ध जगत इसे अशोक विजय
दशमी के रूप में मनाता है।
इसे  राम और रावण कि विजय के विजय के रूप में भी मनाया जाता  है।